Google Analytics —— Meta Pixel
देश

देश (9403)

 

दिल्ली। में चोर इतने बेखौफ हो गए हैं, कि चार दिन पहले उद्घाटन हुए दिल्ली मेट्रो की केबल काट ले गए. जिस मेट्रो लाइन का देश के प्रधानमंत्री ने उद्घाटन किया हो, उस लाइन की केबल कट जाना हैरानी की बात है. चोरों ने ना सिर्फ केबल काटी बल्कि दिल्ली मेट्रो की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा दिया. फिलहाल, पुलिस ने केबल काटने के आरोप में एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. जानकारी के अनुसार, दीपाली चौक-मजलिस पार्क के बीच 9.9 किलोमीटर लंबे रूट पर लगी करीब 1000 मीटर केबल चोरी हो गई. डीएमआरसी के अधिकारियों ने बताया कि केबल चोरी होने की वजह से सिग्नल सिस्टम में बाधा आई. हालांकि इस दौरान भलस्वा से मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के बीच चलाई गई, लेकिन स्पीड सिर्फ 25 किलोमीटर प्रति घंटे ही रही. गुरुवार को दिनभर यह रूट बंद रहा. अगर ऐसे में केबल बिछाई भी जाएगी, तो सबसे पहले संचालन को बंद करना पड़ेगा. बिना बंद करे केबल नहीं बिछाई जा सकती।

 

मुख्य चुनाव। आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष ने संसद में नोटिस दिया है. नोटिस देने में राज्यसभा और लोकसभा दोनों संसद के सदस्य शामिल हैं. यह पहली बार है, जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए ऐसी कार्रवाई की गई है. अगर कोई दल लोकसभा में नोटिस देता है, तो नियमों के अनुसार उसके पास लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों की सहमति जरूरी है. लेकिन विपक्ष ने 193 सांसदों का समर्थन पाकर यह आंकड़ा पार कर लिया है और नोटिस जारी किया है. इसमें मुख्य विपक्षी दलों के साथ ही इंडिया गठबंधन में शामिल सभी पार्टियां और कुछ निर्दलीय सांसद शामिल हैं. जानकारी के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नोटिस देने का कदम तृणमूल कांग्रेस पार्टी का है, जिसका समर्थन सभी इंडिया गठबंधन के सभी छोटे-बड़े दलों के सांसदों ने दिया है. नोटिस में विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयुक्त के खिलाफ कई आरोप लगाए हैं. जिसमें चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को प्रभावित करना, बडे़ पैमाने पर मतदाता वंचित करना, पक्षपातपूर्ण आचरण, चुनावी धांधली की जांच में जानबूझकर बाधा डालना शामिल है. विपक्ष ने दावा किया कि चुनाव आयोग ने भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए लाखों मतदाताओं के नाम हटाए हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर बड़े आरोप लगाए हैं।

 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मादक औषधि एवं मनोरोगी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए जमानत दे दी है। अदालत ने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि वह व्यक्ति पिछले सात साल से अधिक समय से जेल में बंद है और उसकी अपील पर फिलहाल जल्दी सुनवाई होने की संभावना नहीं है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने मनोज कुमार गुप्ता की अपील स्वीकार करते हुए पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पहले उनकी सजा को निलंबित करने और जमानत देने से इनकार किया गया था। मनोज कुमार गुप्ता ने मई 2025 में पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

 

बाड़मेर। राजस्थान में अभी साध्वी प्रेम बाईसा की मौत की गुत्थी सुलझी भी नहीं थी कि अब झाक मठ के मठाधीश महंत पारसनाथ महाराज का शव मिलने से हर कोई हैरान है। बाड़मेर जिले के झाक गांव में 57 साल के महंत पारसनाथ महाराज का शव गुरुवार सुबह मठ परिसर में बने पानी के में पड़ा मिला। लोगों हैरान है कि आखिर महंत की मौत कैसे हुई। मठ सेवकों ने बताया कि गुरुवार तड़के करीब 5 बजे रोज की तरह टांके यानी कुंड से पानी लेने गए थे। तभी उन्होंने देखा कि महंत पारसनाथ पानी में तैर रहे हैं। जब हिलाडुलाकर देखा तो पता चला कि उनकी मौत हो चुकी है। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना गांव वालों और पुलिस को दी।

 

नई दिल्ली|सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक वकील की तरफ से दायर किए गए पांच याचिकाओं को ‘असंगत और बेवजह’ बताते हुए पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) खारिज कर दिए। इनमें से एक याचिका में मांग की गई थी कि यह जांच की जाए कि प्याज और लहसुन में ‘तामसिक’ यानी नकारात्मक ऊर्जा होती है या नहीं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वकील सचिन गुप्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि क्या आप आधी रात को ये सारी याचिकाएं तैयार करते हो? सीजेआई ने इन याचिकाओं को अस्पष्ट, असंगत और बिना आधार वाली बताया।

इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। उन्होंने वकील को कई पीआईएल दायर करने पर फटकार लगाई। बता दें कि प्याज और लहसुन वाली याचिका में यह भी कहा गया था कि जैन धर्म के लोग इसे ‘तामसिक’ भोजन मानते हैं और इन्हें नहीं खाते। इसपर सीजेआई ने पूछा कि आप जैन समुदाय की भावनाओं को क्यों आहत करना चाहते हैं?

वकील ने क्या दलील दी? सीजेआई की सख्त चेतावनी

सीजेआई के फटकार के बाद वकील ने जवाब दिया कि यह आम समस्या है और गुजरात में किसी ने खाने में प्याज इस्तेमाल करने पर तलाक भी लिया। इस पर सीजेआई ने सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर अगली बार आप ऐसी बेवजह याचिका लाएंगे, तो आप देखेंगे कि हम क्या करेंगे।

अन्य याचिका भी की खारिज

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गुप्ता की तरफ से दायर चार अन्य पीआईएल भी खारिज कर दीं। इनमें से एक में शराब और तंबाकू उत्पादों में हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने की मांग थी, दूसरी में संपत्तियों के पंजीकरण को अनिवार्य करने की बात थी, और तीसरी में शास्त्रीय भाषाओं के घोषणा के लिए दिशा-निर्देश मांगने की याचिका थी। पीठ ने कहा कि इन याचिकाओं में मांगे अस्पष्ट थीं और इनके लिए कोई कानूनी आधार नहीं था। सीजेआई ने कहा कि अगर गुप्ता वकील नहीं होते, तो उन्होंने उन पर उदाहरणात्मक जुर्माना लगाया होता।

 

 

कोलकाता|पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर विवाद थमने का नाम नही ले रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद अब उत्तर बंगाल विकास मंत्री उदयन गुहा ने भी मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को उन्होंने कूच बिहार के दिनहाटा में भूख हड़ताल शुरू कर दी। मंत्री का आरोप है कि चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के नाम पर मनमाने ढंग से लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं।

गुहा चुनाव आयोग पर साधा निशाना

उदयन गुहा ने सीधे तौर पर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आयोग भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर काम कर रहा है। उनके नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस सामूहिक भूख हड़ताल में हिस्सा लिया। मंत्री ने बताया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नामों को 'अंडर एडजुडिकेशन' यानी जांच की श्रेणी में डाल दिया गया है। उनके मुताबिक, अकेले कूच बिहार जिले में ही 2.37 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम इस पेंडिंग लिस्ट में रखे गए हैं।

 

नई दिल्ली|संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में आज पश्चिम एशिया में जारी संकट को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में घमासान देखने को मिला है। विदेश मंत्री की तरफ से सदन में पश्चिम एशिया में व्याप्त संकट पर बयान दिया गया। लेकिन इसके बाद से विपक्ष सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस सांसद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, 'पश्चिम एशिया संकट से कितना नुकसान होगा? एक बड़े बदलाव की लड़ाई चल रही है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। आपने शेयर बाजार देखा। प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के साथ समझौता कर लिया है। देश को बड़ा झटका लगने वाला है। तो फिर इस पर चर्चा करने में उन्हें क्या दिक्कत है?'

 

नई दिल्ली|विपक्षी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है और इसे इसी हफ्ते जमा किया जा सकता है। यह पहली बार है जब विपक्षी दल एकजुट होकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ऐसा कड़ा कदम उठा रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक वरिष्ठ सांसद ने बताया कि यह पूरी तरह से विपक्षी दलों की एकजुटता का नतीजा है। उन्होंने कहा कि ड्राफ्ट तैयार करने और इसकी योजना बनाने में सभी समान विचारधारा वाली पार्टियों ने मिलकर काम किया है। संसद के दोनों सदनों में इस योजना को लागू करने के लिए भी सभी दल साथ मिलकर काम करेंगे। टीएमसी नेता ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने गरिमामय पद का अपमान किया है। कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक की अन्य पार्टियों ने भी इस नोटिस का समर्थन करने की बात कही है।

अब विपक्षी सांसद दोनों सदनों के सदस्यों के हस्ताक्षर इकट्ठा करेंगे। नियमों के अनुसार, इस तरह के नोटिस के लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होना जरूरी है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने जैसी ही होती है। उन्हें केवल साबित हुए गलत व्यवहार या काम करने में अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है।

यह प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया

 

नई दिल्ली|केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) सहित चार एजेंसियों में प्रतिनियुक्ति की अवधि बढ़ा दी है। अब इन एजेंसियों में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले कार्मिक पांच वर्ष की बजाए, सात साल तक तैनात रहेंगे। बाकी दो एजेंसियों में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय में पुलिस 2 प्रभाग (कार्मिक-नीति अनुभाग) की तरफ से पांच मार्च को उक्त निर्देश जारी किए गए हैं। बता दें कि एनएसजी द्वारा गृह मंत्रालय से अनुरोध किया गया था कि केंद्रीय एजेंसियों में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले कार्मिकों के कार्यकाल की अवधि पांच वर्ष से बढ़ाकर सात साल कर दी जाए। इस मामले को लेकर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' और असम राइफल 'एआर' के साथ परामर्श किया गया। उसमें यह बात सामने आई कि प्रतिनियुक्ति अवधि बढ़ाए जाने से एनएसजी में कार्मिकों के संस्थागत ज्ञान को बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसी तरह से दूसरी एजेंसियों को लेकर फीडबैक मिला है। इसके मद्देनजर यह निर्णय लिया गया कि 'सीएपीएफ' और 'एआर' कर्मियों को प्रारंभिक नियुक्ति के समय ही सात वर्ष की अवधि के लिए एनएसजी सहित चारों केंद्रीय एजेंसियों में प्रतिनियुक्त किया जाएगा। इसके लिए मंत्रालय द्वारा 22 नवंबर 2016 के नीतिगत दिशानिर्देशों में संशोधन किए गए हैं। पैराग्राफ 3 (बी) (2) में 'प्रतिनियुक्ति की अवधि' शीर्षक के तहत कुछ प्रावधानों में बदलाव किया गया है। विशेष कार्यक्षेत्र वाली जॉब, जैसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) और एनएसजी में अब प्रतिनियुक्ति की अवधि सात वर्ष कर दी गई है। यह अवधि उक्त एजेंसियों में प्रवेश करने के समय से लागू होगी। इन संगठनों को उपयुक्त प्रतिस्थापन नियुक्त करने के लिए काफी पहले से ही अग्रिम कदम उठाने की आवश्यकता होती है। ये आदेश केंद्रीय गृह मंत्री की स्वीकृति से जारी किए गए हैं।

 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अदालत के आदेशों का पालन न करने और अवमानना याचिका दायर होने पर देरी से अपील दाखिल करने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जता दी है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यदि इसतरह के मामलों में सख्ती नहीं दिखाई गई, तब न्यायपालिका में लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्‍ला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि हाल के वर्षों में देखने में आया हैं कि अदालत के आदेशों का लंबे समय तक पालन नहीं होता और जब अवमानना याचिका दायर होती है, तब उसके बाद काफी देरी के साथ अपील या पुनर्विचार याचिका दाखिल होती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अपील में देरी अपवाद होनी चाहिए, लेकिन अब यह करीब-करीब नियम बनती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस तरह की प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं कर सकते है। शीर्ष अदालत के अनुसार, जब कोई पक्ष जानबूझकर अदालत के आदेशों का पालन नहीं करता, इस आचरण से न्यायपालिका की गरिमा और कानून के शासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस तरह के मामलों में यह आचरण कई बार आपराधिक अवमानना की सीमा तक पहुंच सकता है। अदालत ने कहा कि यदि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इन मामलों में दृढ़ता नहीं दिखाते, तब देश के आम नागरिकों का न्यायपालिका में अटूट विश्वास कमजोर पड़ सकता है।

अदालत के अनुसार, आदेश की जानकारी होने के बावजूद यदि कोई पक्ष जानबूझकर उस आदेश का पालन नहीं करता, तब वहां अवमानना के दायरे में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही केवल अदालत में पक्षकार रहे व्यक्तियों तक सीमित नहीं होगी। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी छत्‍तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान की। मामला कर्मचारियों की सेवाओं के नियमितीकरण से जुड़े आदेश के पालन न करने से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों को आदेश लागू करने के लिए अंतिम मौका देकर 15 दिन का समय दिया है।

 

Page 3 of 672

Ads

R.O.NO. 13784/149 Advertisement Carousel

MP info RSS Feed

फेसबुक