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छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने सोमवार को अपने 11 उम्मीदवारों की तीसरी सूची जारी की। बता दें कि छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में दो चरणों में 12 और 20 नवंबर को चुनाव होने हैं। मतों की गणना 11 दिसंबर को होगी। 

 

पहले चरण के चुनाव के लिए प्रचार चरम पर है। भाजपा यहां लगातार 15 साल से सत्ता में है और इस बार सीएम रमन सिंह के सामने सत्ता बचाए रखने की चुनौती है। बसपा और अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के बीच गठजोड़ के चलते मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए पुरजोर कोशिश में है। 

यहां देखें पूरी लिस्ट-



इससे पहले गत 21 अक्तूबर को पार्टी ने अपने 77 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। इसमें एलान किया गया था कि मुख्यमंत्री रमन सिंह राजनांदगांव सीट से चुनाव लड़ेंगे। इन 77 नामों में 14 मौजूदा विधायकों की जगह नए नाम घोषित किए गए थे।  

छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने सोमवार को अपने 11 उम्मीदवारों की तीसरी सूची जारी की। बता दें कि छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में दो चरणों में 12 और 20 नवंबर को चुनाव होने हैं। मतों की गणना 11 दिसंबर को होगी। 

 

पहले चरण के चुनाव के लिए प्रचार चरम पर है। भाजपा यहां लगातार 15 साल से सत्ता में है और इस बार सीएम रमन सिंह के सामने सत्ता बचाए रखने की चुनौती है। बसपा और अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के बीच गठजोड़ के चलते मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए पुरजोर कोशिश में है। 

यहां देखें पूरी लिस्ट-



इससे पहले गत 21 अक्तूबर को पार्टी ने अपने 77 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। इसमें एलान किया गया था कि मुख्यमंत्री रमन सिंह राजनांदगांव सीट से चुनाव लड़ेंगे। इन 77 नामों में 14 मौजूदा विधायकों की जगह नए नाम घोषित किए गए थे।  

बिलासपुर को छत्तीसगढ़ की न्यायधानी कहा जाता है। यहां विधानसभा की कुल सात सीटें हैं, जिनमें पांच सामान्य और एक अनुसूचित जाति और एक अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। बिलासपुर की सातों विधानसभा में पक्के प्रत्याशी हैं, मतलब वे लंबे समय से जीत हासिल करते आए हैं।  लेकिन इस बार चुनावी गणित में बदलाव होने की संभावना जताई जा रही है। आइए डालते हैं नजर बिलासपुर की सातों विधानसभाओं पर-
 
मरवाही विधानसभा 
इस विधानसभा सीट पर कई सालों से जोगी परिवार का कब्जा रहा है। यहां से फिलहाल अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी विधायक हैं। लेकिन इस बार यहां के सियासी समीकरण में बदलाव होने के आसार प्रबल हैं। फिलहाल मरवाही से कांग्रेस ने गुलाब सिंह राज को उतारा है। 

कोटा विधानसभा
कोटा सीट पर पिछले 66 सालों से एक ही पार्टी ने जीत का परचम लहराया है। पिछले 14 विधानसभा चुनावों से कांग्रेस का ही यहां बोलबाला रहा है। इस सीट से कांग्रेस की तरफ से अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी ने चुनाव लड़ा है, लेकिन इस बार जोगी कांग्रेस यहां का सियासी खेल बिगाड़ सकती है। 

 

तखतपुर विधानसभा
तखतपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का एकछत्र राज है, लेकिन इस बार अजीत जोगी की पार्टी भी पूरे दमखम के साथ उतर रही है। बिलासपुर जिले में अजीत जोगी का अच्छा खासा वर्चस्व है। ऐसे में भाजपा को यहां अपना ताज बचाए रखने में मुश्किलात हो सकती है।

बिल्हा विधानसभा
बिल्हा दो जिलों के नक्शे में शामिल है, इस सीट का आधे से ज्यादा हिस्सा मुगेली और एक हिस्सा बिलासपुर जिले में आता है। बिल्हा का चुनावी रण भाजपा के धरमलाल कौशिक और कांग्रेस के सियराम कौशिक के नाम रहा है। 

बिलासपुर विधानसभा
इसे राज्य की हाईप्रोफाइल सीट माना जाता है। यह हमेशा से ही भाजपा का गढ़ रहा है। भाजपा विधायक अमर अग्रवाल यहां से चार बार चुनाव जीत चुके हैं। कांग्रेस के लाख एक्सपेरिमेंट के बाद भी यह सीट उसके हाथों नहीं आ पाई है। 

 

बेलतरा विधानसभा
बेलतरा विधानसभा भी भाजपा का मजबूत किला है। परिसीमन के बाद 15 वर्षों से यहां भाजपा के बद्रीधर दीवान ने यहां जीत दर्ज करते आए हैं। कांग्रेस के लिए इस बार यहा अपनी विजयी गाथा लिखना आसान नहीं होगा। 

मस्तुरी विधानसभा
मस्तुरी विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा है। लेकिन कांग्रेस ने यह जीत बीजेपी के विजयी रथ को रोककर हासिल की  है। पिछले विधानसभा चुनाव में दिलीप सिंह लहरिया ने भाजपा के कृष्णमूर्ति बांधी को हराकर कांग्रेस को अविश्वसनीय जीत दिलाई थी।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने दूरदर्शन की टीम पर हमला किया है। अभी इस बात का पता नहीं चल पाया है कि टीम में कितने लोग शामिल थे। इस हमले में एक पत्रकार की मौत हो गई है।

वायु प्रदूषण की स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 15 वर्ष पुराने पेट्रोल और 10 वर्ष पुराने डीजल वाहनों के परिचालन पर पाबंदी लगा दी है। शीर्ष अदालत ने परिवहन विभागों का कहा कि अगर दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर ऐसे वाहन चलते पाए गए तो उन्हें जब्त कर लिया जाए।  

 

न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की स्थिति को भयावह करार दिया है। मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि हालत यह है कि लोग सुबह की सैर के लिए नहीं निकल सकते।  

पीठ ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड(सीपीसीबी) और परिवहन विभाग की वेबसाइट पर 15 वर्ष पुराने पेट्रोल वाहन व 10 वर्ष पुराने डीजल वाहनों की लिस्ट जारी करने केलिए कहा है। पीठ ने इस संबंध में अखबारों में विज्ञापन निकालने का निर्देश दिया है। इसकेअलावा पीठ ने सीपीसीबी को जल्द से जल्द एक सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए कहा है जिससे कि नागरिक प्रदूषण से संबंधित शिकायतें दर्ज करा सके। इन शिकायतों पर संबंधित अथॉरिटी को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है।  

साथ ही पीठ ने पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण अथॉरिटी(इपका) को ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान(जीआरएपी) के तहत दिए गए प्रदूषण स्तर पहले भी उपचारात्मक कदम उठम उठाने की इजाजत दे दी है।  

सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश अमाइक क्यूरी अपराजिता सिंह द्वारा दायर की गई रिपोर्ट पर दिए हैं। वास्तव में अपराजिता सिंह ने पीठ को बताया कि राजधानी में प्रदूषण की स्थिति इस कदर खराब हो गई है कि जल्द कोई कदम उठाने की दरकार है। 

मालूम हो कि इससे पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) ने दिल्ली में 15 वर्ष पुराने पेट्रोल वाहन व 10 वर्ष पुराने डीजल वाहनों के परिचालन पर पाबंदी लगाई थी और शीर्ष अदालत एनजीटी केआदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर चुकी है।  

सोमवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने उस मीडिया रिपोर्ट का हवाला दिया कि दिल्ली में प्रदूषण इस कदर है कि लोग सुबह की सैर करने तक नहीं जा सकते। पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) एएनएस नादकर्णी से कहा, 'क्या आप पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन गए हैं।

गरीब लोगों को आजीविका चलाने केलिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। उन्हें जिस तरह का परिश्रम करना पड़ता है वह लोधी गार्डन में घूमने वाले लोगों से अधिक है। गरीब मजदूर भारी शारीरिक श्रम करते हैं। क्या आप उन्हें काम करने से यह कह कर रोक सकते हैं सुबह में काम करना सुरक्षित नहीं है। यह बेहद गंभीर स्थिति है। यह भयावह स्थिति है।’ इस पर एएसजी ने कहा कि वह अमाइकस क्यूरी के सुझावों का समर्थन करते हैं। 
 
साथ ही अमाइकस क्यूरी ने इपका द्वारा तैयार की रिपोर्ट और द्वारका, नरेला, बवाना, मुंडका और नांगलोई आदि में कूड़ा जलाने की फोटो पेश की। इस पर पीठ ने दिल्ली सरकार और डीएसआईआईडीसी को दो दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा है। अगली सुनवाई एक नवंबर को होगी। 

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश:  
- दिल्ली-एनसीआर में 15 वर्ष पुराने पेट्रोल व 10 वर्ष पुराने डीजल वाहनों के परिचालन पर पाबंदी  
- ऐसे वाहनों के सड़कों पर पाए गए तो जब्त होंगे 
- वेबसाइट पर 15 वर्ष पुराने पेट्रोल व 10 वर्ष पुराने डीजल वाहनों की सूची जारी करने केलिए कहा 
- अखबारों में विज्ञापन देने का निर्देश 
- सोशल मीडिया अकाउंट बनाने का निर्देश, जहां नागरिक प्रदूषण संबंधित शिकायत दर्ज करा सकें

अयोध्या मामले की सुनवाई जनवरी तक के लिए टल जाने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत समाज से धैर्य रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा वक्त है जब संतों को इस मुद्दे के समाधान में जो भी सार्थक प्रयास हो सकते हैं, उसमें सहभागी बनना चाहिए। जिससे कि देश में शांति और सौहार्द्र की स्थापना हो सके और साथ ही संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान का भाव भी सुदृढ़ हो सके।

 

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है। मैं भी यही चाहता हूं कि इस पर लगातार सुनवाई हो और जल्द से जल्द समाधान निकाला जा सके। देश का बहुसंख्यक समाज यही चाहता है। अगर न्याय मिलने में देरी होती है तो निराशा होती है। कई बार देरी से मिला न्याय अन्याय के समान होता है। हम सभी इस पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। कोई न कोई रास्ता अवश्य निकलेगा।

ये पूछने पर कि क्या अध्यादेश लाना सही विकल्प होगा...। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि मामला कोर्ट में है। देश की शांति ओर सौहार्द्र की स्थापना के लिए जो भी विकल्प हो सकते हैं। उन पर विचार करना चाहिए। अच्छा तो यही होता कि सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई करते हुए निर्णय दे देता लेकिन अभी इसकी संभावना नहीं दिखती। योगी ने कहा कि सर्वसम्मति से इस मसले का समाधान निकले तो सर्वोत्तम है।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई जनवरी तक के लिए टाल दी है। जनवरी 2019 में तय होगा कि सुनवाई कब और कौन सी पीठ करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं। हमें नहीं पता तारीख क्या होगी। यह जनवरी, मार्च या अप्रैल भी हो सकती है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर टकराव की खबरों के बीच आज केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और आरबीआई गर्वनर उर्जित पटेल की आमने-सामने वाली मुलाकात होने जा रही है। 

 

वित्त मंत्री जेटली मंगलवार 30 अक्तूबर को वित्तीय स्थिरता और विकास काउंसिल की मीटिंग की अध्यक्षता करेंगे इसमें उर्जित पटेल भी शामिल होंगे। उर्जित और जेटली की यह मुलाकात तब होने जा रही है जब केंद्रीय बैंक के डिप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले दिनों साफ शब्दों में सरकार को चेताया  था कि अगर उसने संस्थान की स्वायत्तता को ठेस पहुंचाई, तो बाजार को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। 

गर्वनर और सरकार के बीच चल रही तनातनी की खबर ने तब सुर्खियां बटोरी जब पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से आग्रह किया कि वे अपने मतभेदों को बंद दरवाजों के पीछे दूर करने की ओर कदम बढ़ाएं।

चिदंबरम ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा था कि मुझे लगता है कि सरकार और गर्वनर के बीच का मामला काफी गंभीर है। और देश हित में यह सबसे अच्छा होगा अगर आरबीआई और सरकार एक दूसरे से लेक्चर के माध्यम से नहीं बल्कि आमने सामने बात करें और देश की परेशानियों को खत्म करें। इस पूरे मामले ने सरकार ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है अभी तक सरकार की तरफ से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।  

उर्जित से सिर्फ सरकार नहीं बैंकर्स भी हैं नाराज

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल और केंद्र सरकार के बीच बढ़ी दूरियों की खबरें इन दिनों गर्म है। इसी बीच खबर आ रही है कि सर्फ सरकार ही नहीं बल्कि उर्जित से समस्या बड़े बैंकर्स को उनसे कई समस्याएं हैं। लंबे समय से बड़ी संख्या में वरिष्ठ बैंक के अधिकारी उर्जित से नाखुश हैं।

इसकी वजह है खराब ऋण को पहचानने के मानदंडों पर उनका लचीलापन न होना। इसकी वजह से बैंक को अपने व्यवसाय करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं दूसरी तरफ पटेल के करीबीयों का मानना है कि यह सब वह बैंकिंग उद्योग में सफाई करने के लिए कर रहे हैं।

यही नहीं कई बैंकर्स को पटेल के कामकाज के स्टाइल से समस्या  है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वह किसी बी मामले में शायद ही बैंकर्स से कंसलटेशन और फीडबैक के लिए मिलते हैं। जबकि पिछले आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन से भी हमारी कोई बातचीत नहीं होती थी फिरभी वह टॉप बैंक के चेयरमैन से पूछ लेते थे कि अर्थव्यवस्था में क्या चल रहा है।   

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को अयोध्या के राम मंदिर मामले पर सुनवाई की। देश के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद जस्टिस रंजन गोगोई ने पहली बार इस मसले पर सुनवाई की। माना जा रहा था कि अदालत नियमित सुनवाई को लेकर कोई अहम फैसला दे सकती है लेकिन उसने अगले साल जनवरी तक के लिए इसे लटका दिया है। अदालत ने यह भी नहीं बताया है कि जनवरी में किस तारीख से राम मंदिर को लेकर सुनवाई होगी। 

 

राम मंदिर को लेकर देश की सियासत में गहमा-गहमी का माहौल बनने लगा है। जहां एक तरफ सरकार पर विपक्षी पार्टियां अध्यादेश या कानून बनाकर मंदिर निर्माण के लिए दबाव डाल रही हैं। वहीं उसके अंदर से भी मंदिर निर्माण को लेकर आवाजें उठने लगी हैं। मगर सरकार के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि उसकी राह में बहुत से रोड़े हैं। आज हम आपको बताते हैं इस मामले से जुड़ी कुछ अड़चनें।

1993 में आया था कानून

केंद्र सरकार 1993 में अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम लेकर आई थी। जिसके तहत विवादित भूमि और उसके आस-पास की जमीन का अधिग्रहण करते हुए पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल याचिकाओं को खत्म कर दिया गया था। सरकार के इस अधिनियम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। जिसके बाद 1994 में अदालत ने इस्माइल फारूखी मामले में आदेश देते हुए तमाम दावेदारी वाली अर्जियों को बहाल कर दिया था और जमीन केंद्र सरकार के पास रखने को कहा था। अदालत ने निर्देश दिया था कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे जमीन सौंप दी जाएगी।

दोबारा नहीं बनेगा कानून

मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी का कहना है कि अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम 1993 में लाए गए कानून को उच्चतम न्यायालय मे चुनौती दी गई थी। उस समय अदालत ने कहा था कि अधिनियम लाकर अर्जियों को खत्म करना गैर संवैधानिक है। सरकार लंबित मामले पर कानून नहीं ला सकती है। यह न्यायिक प्रक्रिया में दखलअंदाजी होगा।

बरकरार रहेगी यथास्थिति

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज एसआर सिंह का कहना है कि विधायिका उच्चतम न्यायालय के आदेश को खारिज या निष्प्रभावी करने के मकसद से कानून में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं कर सकती है। बल्कि वह फैसले के आधार पर कानून में बदलाव कर सकती है। अयोध्या मंदिर मामला अभी देश के उच्चतम न्यायालय में लंबित है और वहां यथास्थिति को बरकरार रखने के लिए कहा गया है। यदि सरकार ऐसे में कोई कानून बनाती है तो यह अदालती कार्यवाही में दखल होगा। 

मामला लंबित रहने तक नहीं बनेगा कानून

दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज आरएस सोढ़ी ने अयोध्या मामले पर कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 1994 में एक फैसला दिया था। तमाम पक्षकारों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है। जहां मामला लंबित है। ऐसी परिस्थिति में सरकार आधिकारिक तौर पर कोई दखल नहीं दे सकती है। हालांकि पक्षकार चाहें तो वह किसी भी समय आपसी समझौता कर सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर के पुंछ में सोमवार को सेना ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देते हुए पुंछ ब्रिगेड पर गोला दागे जाने का बदला ले लिया। सोमवार दोपहर भारतीय सेना ने पुंछ में पुलस्त नदी के उस पार पाक अधिकृत क्षेत्र के हजीरा इलाके में स्थित पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेड मुख्यालय और कई आतंकी शिविरों को निशाना बनाते हुए गोले दागे। भारतीय सेना ने यह कार्रवाई पुंछ ब्रिगेड मुख्यालय पर पाकिस्तानी सेना द्वारा दागे गए गोले का बदला लेने के लिए की। पाकिस्तान को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। पाकिस्तान की कुछ चौकियों के तबाह होने की भी सूचना है। हालांकि सीमा पार हुए नुकसान का ब्योरा नहीं मिल पाया है। सेना के ताजा आपरेशन की सेटेलाइट तस्वीरें सामने आईं हैं।

बिहार के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन को सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा झटका दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सिवान में दो भाइयों सतीश राज और गिरीश राज की हत्या के मामले में शहाबुद्दीन की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। 

 

बता दें कि इस दोहरे हत्याकांड में शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इसी फैसले के खिलाफ बाहुबली नेता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन अदालत ने शहाबुद्दीन की अपील को खारिज कर दिया। 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा कि इस दोहरे हत्याकांड के गवाह तीसरे भाई राजीव रोशन की अदालत में गवाही देने जाते समय हत्या क्यों की गई? इस हमले के पीछे कौन था? अदालत ने कहा है कि वह हाईकोर्ट के फैसले में दखल नहीं देगा। इस अपील में कानूनी तथ्य नहीं है। 

बता दें कि अगस्त 2004 में सिवान में दो भाइयों सतीश राज और गिरीश राज की शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर में ही तेजाब से नहला कर हत्या कर दी गई थी। बाद में इस हत्याकांड के इकलौते चश्मदीद और उनके तीसरे भाई राजीव रोशन की भी 16 जून, 2014 को बीच चौराहे पर गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। 

इस मामले में 9 दिसंबर, 2015 को निचली अदालत ने फैसला सुनाते हुए शहाबुद्दीन और अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद शहाबुद्दीन ने साल 2017 में फैसले के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय ने अपील की थी, लेकिन वहां भी उसकी अपील खारिज हो गई थी।

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